मूवीज़ का प्रभाव

मूवीज़ का प्रभाव किसी को रोमांटिक फ़िल्में पसंद होती हैं, किसी को हॉरर, किसी को सस्पेंस, तो किसी को एक्शन। हर व्यक्ति अपनी रुचि के अनुसार फ़िल्में देखना पसंद करता है। फ़िल्में केवल मनोरंजन का साधन नहीं हैं, बल्कि वे हमारी सोच, भावनाओं और व्यवहार पर भी गहरा प्रभाव डालती हैं। क्या आपने कभी सोचा है कि एक फ़िल्म हमारे जीवन को किस हद तक प्रभावित कर सकती है? हम अक्सर यह मानते हैं कि फ़िल्म देखकर कुछ घंटों का मनोरंजन हो जाता है, लेकिन कई बार वही फ़िल्म हमारे विचार बदल देती है, हमारे निर्णयों को प्रभावित करती है और जीवन को देखने का हमारा नज़रिया भी बदल देती है। हर फ़िल्म किसी न किसी उद्देश्य से बनाई जाती है। कोई फ़िल्म समाज को संदेश देती है, कोई इतिहास से परिचित कराती है, कोई प्रेरणा देती है और कोई केवल मनोरंजन के लिए बनाई जाती है। मेरा मानना है कि कोई भी फ़िल्म निर्माता जानबूझकर लोगों को गलत राह दिखाने के उद्देश्य से फ़िल्म नहीं बनाता। लेकिन एक ही फ़िल्म से कौन क्या सीखता है, यह पूरी तरह दर्शक की सोच और समझ पर निर्भर करता है। कुछ लोग फ़िल्म के हीरो से प्रेरणा लेते हैं, तो कुछ विलेन के अंदाज़ को पसंद करने लगते हैं। कई बार लोग किसी किरदार से इतने प्रभावित हो जाते हैं कि उसे अपने वास्तविक जीवन से जोड़ लेते हैं। फ़िल्म देखते समय दुखद दृश्य पर हमारी आँखें नम हो जाती हैं, अन्याय देखकर गुस्सा आता है और खुशी के दृश्य देखकर चेहरे पर मुस्कान आ जाती है। जैसे-जैसे पर्दे पर दृश्य बदलते हैं, वैसे-वैसे हमारे मन की भावनाएँ भी बदलती जाती हैं। यही फ़िल्मों का मनोवैज्ञानिक प्रभाव है। मैंने यह भी महसूस किया है कि बच्चों पर फ़िल्मों और टीवी कार्यक्रमों का प्रभाव सबसे अधिक पड़ता है। बच्चे अपने पसंदीदा हीरो को अपना आदर्श मान लेते हैं और उसकी हर बात की नकल करने लगते हैं। यदि हीरो कोई अच्छा काम करता है, तो यह सकारात्मक बात है। लेकिन यदि वह किसी गलत या खतरनाक तरीके से बदला लेता है या ऐसा कोई काम करता है जिसे वास्तविक जीवन में नहीं करना चाहिए, तो कई बार बच्चे बिना सही-गलत समझे उसकी नकल करने लगते हैं। मुझे याद है कि एक समय टीवी का लोकप्रिय कार्यक्रम शक्तिमान बच्चों के बीच बहुत प्रसिद्ध था। उसमें शक्तिमान उड़ता था, गोल-गोल घूमकर गायब हो जाता था और अपनी अद्भुत शक्तियों से लोगों की रक्षा करता था। उस समय ऐसी कई खबरें और चर्चाएँ सामने आई थीं कि कुछ बच्चों ने उसके कारनामों की नकल करने की कोशिश की, जिसके कारण दुर्घटनाएँ भी हुईं। चाहे उन घटनाओं के बारे में अलग-अलग मत रहे हों, लेकिन इसने यह ज़रूर दिखाया कि बच्चे जो देखते हैं, उसका प्रभाव उनके मन पर गहराई से पड़ सकता है। वर्तमान समय में मैंने यह भी देखा है कि छोटे-छोटे बच्चों को फ़िल्मों के वे गाने, जो सोशल मीडिया पर वायरल होते हैं, मुँहज़बानी याद रहते हैं। इतना ही नहीं, वे उन गानों के डांस स्टेप्स भी बड़ी आसानी से सीख लेते हैं। इसमें कोई बुराई नहीं है, क्योंकि संगीत और नृत्य बच्चों के विकास का हिस्सा भी हो सकते हैं। लेकिन चिंता तब होती है जब बच्चे फ़िल्मों में दिखाई जाने वाली दूसरी चीज़ों की भी नकल करने लगते हैं, जैसे किसी अभिनेता की हेयरस्टाइल, पहनावा, बोलने का तरीका या ऐसा व्यवहार जो उनकी उम्र के लिए उचित नहीं होता। आज अधिकांश फ़िल्मों पर यह स्पष्ट लिखा होता है कि वे किस आयु वर्ग के लिए उपयुक्त हैं। लेकिन सोशल मीडिया के इस दौर में कोई भी दृश्य, गाना या संवाद कुछ ही मिनटों में हर मोबाइल तक पहुँच जाता है। ऐसे में बच्चों का हर सामग्री से बच पाना आसान नहीं है। इसलिए मेरा मानना है कि यदि हम बच्चों का भविष्य उज्ज्वल बनाना चाहते हैं और उनमें अच्छे संस्कार तथा अच्छी आदतें विकसित करना चाहते हैं, तो केवल रोक-टोक करना ही पर्याप्त नहीं है। हमें उन्हें यह भी सिखाना होगा कि मनोरंजन और वास्तविक जीवन में क्या अंतर है, क्या अपनाना चाहिए और किन बातों से दूरी बनाए रखना ही समझदारी है। माता-पिता, शिक्षक और समाज—तीनों की यह जिम्मेदारी है कि वे बच्चों को सही दिशा दें। मूवीज़ न तो पूरी तरह अच्छी होती हैं और न ही पूरी तरह बुरी। वे एक माध्यम हैं, जिनसे हम प्रेरणा भी ले सकते हैं और यदि सावधानी न बरतें तो भटक भी सकते हैं। इसलिए आवश्यकता इस बात की है कि हम फ़िल्मों को समझदारी से देखें, उनकी अच्छी बातों को अपने जीवन में अपनाएँ और नकारात्मक बातों को केवल मनोरंजन तक ही सीमित रखें। जब दर्शक जागरूक होगा, तभी फ़िल्मों का प्रभाव भी सकारात्मक होगा। ©® दीक्षा

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