यशोधरा – भाग 2
वहीं पास के एक छोटे से गाँव में यशोधरा का विवाह हो गया। विवाह के बाद वह अपने नए घर, अपने ससुराल, चली आई। शुरुआत में सब कुछ किसी सुंदर सपने जैसा था।
यशोधरा का पति एक समझदार, मेहनती और शांत स्वभाव का इंसान था। उसके सास-ससुर भी उसे अपनी बेटी से बढ़कर प्यार करते थे। दरअसल, उनके घर कभी बेटी का जन्म नहीं हुआ था। इसलिए जब यशोधरा बहू बनकर आई, तो उन्होंने उसे बहू नहीं, अपनी बेटी का स्थान दिया। यशोधरा भी पूरे मन से अपने परिवार की सेवा करती और सभी का सम्मान करती थी। घर में हँसी-खुशी का माहौल था।
लेकिन कहते हैं ना, समय हमेशा एक जैसा नहीं रहता। कभी-कभी जीवन अचानक ऐसा मोड़ ले लेता है, जिसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की होती।
गाँव में काम की कमी होने लगी। खेती से घर का खर्च चलाना मुश्किल हो गया। ऐसे में यशोधरा और उसके पति ने एक कठिन फैसला लिया। बेहतर भविष्य और परिवार की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए उन्हें शहर जाना पड़ा।
भारी मन से दोनों ने अपने बुज़ुर्ग माता-पिता को गाँव में ही छोड़ दिया और रोज़गार की तलाश में शहर की ओर निकल पड़े।
उन्हें क्या पता था कि यह सफ़र सिर्फ़ गाँव से शहर तक का नहीं, बल्कि उनकी ज़िंदगी को पूरी तरह बदल देने वाला सफ़र बनने वाला था।
©®दीक्षा
हम पेड़ नहीं अपनी साँसें काट रहे है
पेड़ बचाइए, अपना भविष्य बचाइए बचपन से ही मेरी रुचि पेड़ों की ओर रही है। स्कूल की किताबों में हमेशा पढ़ा कि पेड़ों की कटाई से प्रकृति को बहुत नुकसान होता है। जैसे-जैसे मैं बड़ी हुई, मुझे यह एहसास हुआ कि यह केवल किताबों की बात नहीं, बल्कि हमारे जीवन का सबसे बड़ा सत्य है। वास्तव में, हम जीवित हैं तो पेड़ों की वजह से। यदि धरती से सारे पेड़ खत्म हो जाएँ, तो हम साँस कैसे लेंगे? हम सभी जानते हैं कि हमें जीवनदायी ऑक्सीजन पेड़ों से मिलती है, फिर भी हम लगातार उन्हें काटते जा रहे हैं। मुझे आज भी बचपन की एक कहानी याद है, जो मैंने शायद पाँचवीं या छठी कक्षा में पढ़ी थी। वह कहानी थी अमृता देवी बिश्नोई की। उन्होंने कहा था— "सिर सांटे रूंख रहे, तो भी सस्तो जाण।" अर्थात, यदि पेड़ बचाने के लिए सिर भी कट जाए, तो भी यह सस्ता सौदा है। उन्होंने केवल यह कहा ही नहीं, बल्कि पेड़ों की रक्षा करते हुए अपने प्राणों का बलिदान भी दे दिया। यह हमें सिखाता है कि प्रकृति के प्रति सच्चा प्रेम केवल शब्दों से नहीं, बल्कि कर्मों से साबित होता है। आज हम "पेड़ बचाओ" जैसे अभियान तो चलाते हैं, लेकिन क्या वास्...
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