यशोधरा – भाग 2 वहीं पास के एक छोटे से गाँव में यशोधरा का विवाह हो गया। विवाह के बाद वह अपने नए घर, अपने ससुराल, चली आई। शुरुआत में सब कुछ किसी सुंदर सपने जैसा था। यशोधरा का पति एक समझदार, मेहनती और शांत स्वभाव का इंसान था। उसके सास-ससुर भी उसे अपनी बेटी से बढ़कर प्यार करते थे। दरअसल, उनके घर कभी बेटी का जन्म नहीं हुआ था। इसलिए जब यशोधरा बहू बनकर आई, तो उन्होंने उसे बहू नहीं, अपनी बेटी का स्थान दिया। यशोधरा भी पूरे मन से अपने परिवार की सेवा करती और सभी का सम्मान करती थी। घर में हँसी-खुशी का माहौल था। लेकिन कहते हैं ना, समय हमेशा एक जैसा नहीं रहता। कभी-कभी जीवन अचानक ऐसा मोड़ ले लेता है, जिसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की होती। गाँव में काम की कमी होने लगी। खेती से घर का खर्च चलाना मुश्किल हो गया। ऐसे में यशोधरा और उसके पति ने एक कठिन फैसला लिया। बेहतर भविष्य और परिवार की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए उन्हें शहर जाना पड़ा। भारी मन से दोनों ने अपने बुज़ुर्ग माता-पिता को गाँव में ही छोड़ दिया और रोज़गार की तलाश में शहर की ओर निकल पड़े। उन्हें क्या पता था कि यह सफ़र सिर्फ़ गाँव से शहर तक का नहीं, बल्कि उनकी ज़िंदगी को पूरी तरह बदल देने वाला सफ़र बनने वाला था। ©®दीक्षा

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